अवधारणा पत्र

“भारतीय साहित्य, समाज, संस्कृति एवं शिक्षा : समकालीन विमर्श” भारतीय वैचारिक परंपरा के पुनर्पाठ और समकालीन संदर्भों में उसके अनुप्रयोग का एक महत्वपूर्ण अकादमिक प्रयास है। इस संगोष्ठी का ध्येय उस शास्त्रीय दृष्टि से प्रेरित है- “साहित्यसङ्गीतकलाविहीनः साक्षात्पशुः पुच्छविषाणहीनः। विद्या ददाति विनयं विनयाद्याति पात्रताम्”- जो यह प्रतिपादित करता है कि साहित्य, कला और विनय से युक्त विद्या ही सच्चे अर्थों में मानव का निर्माण करती है। इसी विचारभूमि के आधार पर यह आयोजन साहित्य, समाज, संस्कृति और शिक्षा के परस्पर संबंधों का समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण करता है।भारतीय सभ्यता में इन चारों स्तंभों ने सदैव ज्ञान, संस्कार और सामाजिक उत्तरदायित्व के निर्माण में केंद्रीय भूमिका निभाई है। वैश्वीकरण और तकनीकी परिवर्तन के वर्तमान युग में सांस्कृतिक अस्मिता के संरक्षण, मूल्य-आधारित शिक्षा के विकास तथा साहित्य की सामाजिक भूमिका के पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता और अधिक प्रासंगिक हो गई है। यह संगोष्ठी विद्वानों, शिक्षाविदों और शोधार्थियों के लिए एक साझा मंच प्रदान करेगी, जहाँ परंपरा और आधुनिकता के मध्य संतुलित संवाद संभव हो सकेगा। हमारा संकल्प एक ऐसे सुसंस्कृत और प्रबुद्ध समाज की दिशा में वैचारिक योगदान देना है, जहाँ आधुनिक ज्ञान और भारतीय संस्कारों का सार्थक समन्वय राष्ट्र के बौद्धिक भविष्य को सुदृढ़ आधार प्रदान करे।

संगोष्ठी की स्मृतियां

Event Gallery

Awardee

Scroll to Top